चाक पर आकार लेगी कल्पना, मिट्टी से कलाकृतियां बनाना सीखेंगे युवा, शिल्पकार राजेंद्र प्रजापति देंगे प्रशिक्षण, समापन पर लगेगी कलाकृतियों की प्रदर्शनी
भीलवाड़ा (पंकज पोरवाल)। आधुनिकता की दौड़ में पारंपरिक मिट्टी शिल्प की पहचान कहीं खो न जाए, इसी उद्देश्य से आकृति कला संस्थान नई पीढ़ी को कुम्हारी कला और टेराकोटा शिल्प से जोड़ने की पहल कर रहा है। संस्थान की ओर से 1 से 3 नवंबर तक तीन दिवसीय कार्यशाला आयोजित की जाएगी, जिसमें शिल्पकार राजेंद्र प्रजापति प्रतिभागियों को चाक पर मिट्टी को आकार देने से लेकर आकर्षक कलाकृतियां तैयार करने तक का व्यावहारिक प्रशिक्षण देंगे। इसमें अलंकृत दीपक, मोमबत्ती स्टैंड, लैंप स्टैंड सहित विभिन्न सजावटी और रचनात्मक वस्तुओं का निर्माण सिखाया जाएगा। प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को पारंपरिक चाक (व्हील) के माध्यम से मिट्टी को आकार देने, वस्तुओं की संरचना तैयार करने और उनमें कलात्मक अलंकरण करने की तकनीकों से परिचित कराया जाएगा। इससे प्रतिभागियों को पारंपरिक शिल्पकला सीखने के साथ अपनी कल्पनाशीलता को कलाकृतियों के रूप में अभिव्यक्त करने का अवसर मिलेगा। आकृति कला संस्थान का उद्देश्य विलुप्त होने के कगार पर पहुंच रही पारंपरिक मिट्टी कला और कुम्हारी शिल्प परंपरा को संरक्षित करना है। आधुनिक जीवनशैली के बीच पारंपरिक हस्तशिल्प के प्रति घटती रुचि को देखते हुए संस्थान नई पीढ़ी को इस कला से जोड़ने और भारतीय शिल्प विरासत के संरक्षण के प्रति जागरूक करने का प्रयास कर रहा है। संस्थान के अनुसार, मिट्टी भारतीय लोक संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा है। मिट्टी से कलात्मक वस्तुएं बनाने की प्रक्रिया से प्रतिभागियों में हस्तकौशल, सौंदर्यबोध और रचनात्मकता विकसित होने के साथ पारंपरिक कलाओं के प्रति सम्मान भी बढ़ेगा। कार्यशाला में भाग लेने वाले प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र और स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया जाएगा। समापन पर प्रतिभागियों द्वारा तैयार की गई कलाकृतियों की प्रदर्शनी भी लगाई जाएगी, जिसमें उनके शिल्प कौशल और रचनात्मक प्रतिभा को प्रदर्शित किया जाएगा। आकृति कला संस्थान की यह पहल पारंपरिक मिट्टी शिल्प को प्रोत्साहित करने, युवाओं में कला के प्रति रुचि बढ़ाने और भारतीय लोक एवं हस्तशिल्प परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।




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