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472 साल पुराने श्री दूधाधारी गोपाल मंदिर का पाटोत्सव कल, 31 फीट ऊंचा शिखर


मीरां काल का मंदिर, जहां भक्त की विनती पर भगवान दूध पीने आते



भीलवाडा। (पंकज पोरवाल) प्रभू श्रीकृष्ण की परम भक्त मीरां बाई के काल का एक मंदिर धर्मनगरी भीलवाड़ा में भी है। ऐसा कहते हैं कि यहां पुजारी की विनती पर भगवान दूध पीने आते थे। इसी वजह से सांगानेरी गेट के पास स्थित इस मंदिर का नाम भी श्री दूधाधारी गोपाल मंदिर हो गया। यहां गोपाल प्रभू (प्रभू श्रीकृष्ण) श्री लाड़ली जू (राधा रानी) संग विराजे हैं। भीलवाड़ा में पुरातन निंबार्क संप्रदाय के गोपाल मंदिर की स्थापना निंबार्क संप्रदाय की परंपरानुसार मन्दिर के प्रथम महंत श्री सुंदर दास जी महाराज ने संवत् 1609 बसंत पंचमी सोमवार को अभिजीत मुहूर्त में करवाई थी। पुजारी पं. कल्याण शर्मा ने बताया कि मंदिर के इतिहास का 472 साल का रिकॉर्ड है। बहियों में और ताम्रपत्रों के अनुसार ये मीरां काल का मंदिर है। मंदिर का  473वां पाटोत्सव 23 जनवरी, शुक्रवार को मनाया जाएगा। सुबह 6:15 बजे ठाकुर जी का पंचामृत अभिषेक एवं तुलसी सहस्त्रार्चन होगा। इसके बाद ठाकुर और ठकुरानी का मनमोहक श्रृंगार किया जाएगा। सुबह 10 से 12 बजे तक फाग कार्यक्रम होगा। फिर ठाकुर-ठकुरानी जी को छप्पनभोग आरोगाया जाएगा। दोपहर 12:15 बजे पाटोत्सव आरती होगी। श्रीधाम वृंदावन (मथुरा) के प्रेम मंदिर की तर्ज पर बने दो मंजिला नए महल में ठाकुर जी 21 जून 2023 को विराजे।


प्रेम मंदिर इटालियन पत्थर से बना है, जबकि गोपाल जी मंदिर राजसमंद के सफेद मार्बल पत्थरों से। दोनों दुमंजिला है। करोड़ों की लागत से लगभग 5 हजार वर्गफीट जमीन पर बने इस मंदिर की ऊंचाई 61 फीट है। 15-15 फीट की पहली व दूसरी मंजिल है। पहली मंजिल पर गर्भ गृह (निज मंदिर) है, जिसमें ठाकुरजी विराजे हैं। दूसरी मंजिल पर ठाकुरजी का शयन कक्ष है। पिंडवाड़ा के करीब 40 कारीगरों ने मार्बल पत्थरों को नक्काशी कर जोड़ा।

तो ठाकुर जी को तहखाने में छिपा देते

गोपाल जी मंदिर का 31 फीट ऊंचा शिखर भी मार्बल का ही बनाया है। कहा जाता है कि पहले मंदिर पर शिखर नहीं था, क्योंकि मुगल शासक शिखर देखते ही मंदिर ध्वस्त कर देते थे। मंदिर में एक तहखाना था। कोई मुगल मूर्ति तोड़ने आता था तो ठाकुर जी का विग्रह तहखाने में छिपा देते थे।

पहला मंदिर, जहां होती मल्लुखंभ लीला

पुजारी पं. कल्याण शर्मा बताते हैं कि भीलवाड़ा शहर का यह पहला मंदिर है, जहां ब्रज की तरह श्री कृष्ण जन्मोत्सव के दूसरे दिन मटकी फोड़ व मल्लखंभ लीला होती है। श्रावण में झूलनोत्सव व फागुन में फाग उत्सव मनाया जाता है। हर त्यौहार पर उत्सव का उल्लास बिखरता है।