कैमरे मौन, जीरो डिस्चार्ज के दावे साबित हो रहे खोखले, बंजर होती जमीन और बढ़ता बीमारियों का खतरा
भीलवाड़ा (पंकज पोरवाल)। राजस्थान के मेवाड़ अंचल की जीवनरेखा मानी जाने वाली बनास नदी आज गंभीर प्रदूषण संकट से जूझ रही है। कभी स्वच्छ जल और समृद्ध पारिस्थितिकी के लिए पहचानी जाने वाली यह नदी अब ‘काले जहर’ के साये में सिमटती जा रही है। भीलवाड़ा-चित्तौड़गढ़ मार्ग स्थित औद्योगिक इकाइयों द्वारा नियमों को ताक पर रखकर छोड़ा जा रहा केमिकल युक्त काला पानी अब क्षेत्र के लिए गंभीर संकट बनता जा रहा है। औद्योगिक अपशिष्ट, रासायनिक बहाव और प्रशासनिक लापरवाही ने मिलकर बनास के अस्तित्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि नदी के आसपास का जीवन मानव, पशु और कृषि सभी पर इसका सीधा असर दिखाई देने लगा है। ग्रामिणों का आरोप है कि रात के अंधेरे में चोरी-छिपे बहाया जा रहा यह दूषित जल न केवल सरकारी दावों की पोल खोल रहा है, बल्कि हजारों ग्रामीणों के जीवन को भी खतरे में डाल रहा है। प्रदूषण नियंत्रण मंडल द्वारा ‘जीरो डिस्चार्ज’ के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं और निगरानी के लिए ऑनलाइन मॉनिटरिंग व कैमरों की ‘तीसरी आंख’ का हवाला दिया जाता है, लेकिन धरातल पर स्थिति इसके विपरीत नजर आ रही है। प्रदूषण नियंत्रण के लिए लगाए गए सीसीटीवी कैमरे और ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम भी सवालों के घेरे में हैं। स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि ये सिस्टम या तो ठीक से काम नहीं कर रहे या फिर जानबूझकर नजर अंदाज किए जा रहे हैं। फैक्ट्रियों से छोड़ा जा रहा जहरीला पानी नालों के जरिए आगे बढ़कर मेवाड़ की गंगा कही जाने वाली बनास नदी में मिल रहा है, जिससे इसके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। इस प्रदूषण का सीधा असर कृषि और पेयजल पर पड़ रहा है। गुवारड़ी, मंडपिया, कल्याणपुरा, मंगरोप, खातीखेड़ा, पाटनिया, पीपली, सियार, कलूंदिया, महेशपुरा, सोलंकियों का खेड़ा, रेण और गेंदलिया सहित कई गांवों की उपजाऊ जमीन बंजर होने की कगार पर पहुंच गई है। जल स्त्रोत दूषित हो चुके हैं, जिससे पशु-पक्षियों और इंसानों के लिए स्वच्छ पानी का संकट गहरा गया है। प्रदूषित पानी का असर लोगों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर रूप से पड़ रहा है। आसपास के गांवों में त्वचा रोग, सांस संबंधी समस्याएं और पेट की बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। डॉक्टरों का कहना है कि लंबे समय तक ऐसे पानी के संपर्क में रहने से कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है। ग्रामीणों का आरोप है कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) और प्रदूषण नियंत्रण मंडल के सख्त निर्देशों के बावजूद कुछ प्रभावशाली औद्योगिक इकाइयां मनमानी कर रही हैं। रात के समय नालों में छोड़ा गया यह काला पानी गुवारड़ी नाले के माध्यम से मंडपिया के पास बनास नदी में पहुंच रहा है, जो पर्यावरण नियमों का खुला उल्लंघन है। पर्यावरणविद् बाबूलाल जाजू ने स्थिति पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि भीलवाड़ा की जीवनदायिनी कोठारी और बनास नदियां आज जहरीले और बदबूदार पानी से दम तोड़ रही हैं। उन्होंने प्रशासन पर सवाल उठाते हुए कहा कि कैमरे और निगरानी के दावे केवल कागजों तक सीमित हैं, जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आ रही। कई बार शिकायतों के बावजूद न तो नियमित निरीक्षण होता है और न ही दोषी इकाइयों पर सख्त कार्रवाई। इससे यह संदेह और गहरा होता जा रहा है कि कहीं न कहीं निगरानी तंत्र में बड़ी खामियां हैं या फिर मिलीभगत। जाजू ने मांग की कि जिम्मेदार अधिकारी तुरंत संज्ञान लेकर दोषी इकाइयों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करें और उनके लाइसेंस निरस्त किए जाएं। स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने कई बार प्रशासन से शिकायत की, लेकिन ठोस कार्रवाई के अभाव में लोगों का आक्रोश बढ़ता जा रहा है। उनका कहना है कि यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो बनास नदी का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कागजी योजनाओं और दावों से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए कड़े नियमों का पालन, पारदर्शी निगरानी और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जरूरी है।

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